): वैश्विक वित्तीय बाजारों में इन दिनों अमेरिकी डॉलर की लगातार गिरती कीमतों ने हलचल मचा रखी है। डॉलर इंडेक्स में इस साल अब तक दर्ज 11% की गिरावट को 1973 के बाद, यानी पिछले 52 सालों में, अर्ध-वार्षिक आधार पर सबसे बड़ी गिरावट माना जा रहा है। विशेषज्ञ इसे डॉलर में ‘नई कमजोरी की शुरुआत’ का संकेत दे रहे हैं।
डॉलर इंडेक्स की स्थिति और चिंता के कारण
न्यूयॉर्क इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज (ICE) के आँकड़ों के मुताबिक, डॉलर इंडेक्स वर्तमान में 98.57 के स्तर पर पहुँच गया है। यह इंडेक्स अमेरिकी डॉलर की कीमत को यूरो, येन, पाउंड जैसी छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले मापता है। हालाँकि जुलाई में 96.22 के निचले स्तर से इसमें मामूली सुधार देखा गया, लेकिन यह स्तर अभी भी पिछले कई वर्षों की तुलना में काफी कमजोर माना जा रहा है।
गिरावट के प्रमुख कारण और सहारा देने वाले कारक
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तीसरी तिमाही में लगभग 3% की जीडीपी वृद्धि का अनुमान और मई के बाद विदेशी निवेशकों द्वारा अमेरिकी परिसंपत्तियों की फिर से खरीदारी जैसे कारक डॉलर को थोड़ा सहारा दे रहे हैं। इसके अलावा, अमेरिकी लंबी अवधि की ब्याज दरों का 4% से ऊपर बने रहना भी डॉलर के लिए सहायक रहा है। हालांकि, दूसरी ओर, जापान में सानाए ताकाइची के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीदों से येन के कमजोर पड़ने और फ्रांस में राजनीतिक उठापटक के कारण यूरो पर बने दबाव ने भी डॉलर को अप्रत्यक्ष रूप से कुछ राहत पहुँचाई है।
वॉल स्ट्रीट की चेतावनी: 2026 तक और 10% गिरावट संभव
वॉल स्ट्रीट की दिग्गज संस्थाएं इस गिरावट को स्थायी मान रही हैं। मॉर्गन स्टैनले का कहना है कि 2010 से चल रहा “डॉलर स्ट्रेंथ साइकल” अब समाप्त हो चुका है। बैंक ने अनुमान जताया है कि 2026 के अंत तक डॉलर में और 10% तक की गिरावट आ सकती है। इसका मुख्य कारण अमेरिकी आर्थिक विकास दर और ब्याज दरों का अन्य विकसित देशों के स्तर के करीब पहुँचना बताया जा रहा है। गोल्डमैन सैक्स और ING बैंक ने भी चिंता जताई है कि अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Fed) ने और अधिक ‘ढीली मौद्रिक नीति’ (Dovish Stance) अपनाई, तो डॉलर की गिरावट की रफ्तार और तेज हो सकती है।
विपरीत नजरिया: गिरावट रुक भी सकती है
हालाँकि, सभी एक्सपर्ट्स इस निराशावादी दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। नेड डेविस रिसर्च जैसी संस्थाओं का मानना है कि अमेरिका और यूरोजोन के बीच ब्याज दरों का अंतर कम हो गया है और ‘क्रय शक्ति समता’ (PPP) के आधार पर डॉलर अब अत्यधिक महंगा (ओवरवैल्यूड) नहीं रह गया है। इसलिए, आने वाले महीनों में डॉलर का भाव साइडवेज (स्थिर) या फ्लैट भी चल सकता है।
Author: manoj Gurjar
मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।








