जावेद अख्तर बनाम मुफ्ती शमाइल: ‘ईश्वर का अस्तित्व’ पर ऐतिहासिक बहस, सोशल मीडिया पर छिड़ी नई वैचारिक जंग

मशहूर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर और युवा इस्लामिक विद्वान मुफ्ती शमाइल अहमद के बीच दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई तीखी और तार्किक बहस ने सोशल मीडिया से लेकर बौद्धिक गलियारों तक हलचल मचा दी है। यह बहस ‘क्या ईश्वर का अस्तित्व है?’ जैसे जटिल और संवेदनशील विषय पर केंद्रित रही, जिसका आयोजन दी लल्लनटॉप के मंच पर किया गया। करीब दो घंटे चली इस बहस की मेजबानी वरिष्ठ पत्रकार सौरभ द्विवेदी ने की। कार्यक्रम में ‘नास्तिकता’ बनाम ‘ईश्वरवाद’ का ऐसा सीधा और सभ्य टकराव देखने को मिला, जिसने दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया।

नास्तिकता बनाम धार्मिक दर्शन: सीधा मुकाबला

जावेद अख्तर ने हमेशा की तरह खुलकर ‘नास्तिकता’ (Atheism) का पक्ष रखा। उनका तर्क था कि हर चीज के लिए किसी निर्माता की अनिवार्यता का दावा अपने आप में विरोधाभासी है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि हर चीज का कोई मेकर है, तो फिर ईश्वर का मेकर कौन है?
वहीं मुफ्ती शमाइल अहमद ने ‘ईश्वरवाद’ (Theism) का बचाव करते हुए ‘बौद्धिक डिजाइन’ (Intelligent Design), ‘बिग बैंग’ और ‘जेनेटिक्स’ जैसे आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह एक घड़ी या मोबाइल बिना निर्माता के नहीं बन सकता, उसी तरह यह जटिल ब्रह्मांड भी बिना रचयिता के नहीं हो सकता।

नैतिकता पर बहस: मजहब या मानवता?

बहस का एक अहम हिस्सा नैतिकता (Morality) पर केंद्रित रहा। मुफ्ती शमाइल का मानना था कि बिना किसी ईश्वरीय मार्गदर्शन के नैतिकता का स्थायी आधार नहीं बन सकता। इसके जवाब में जावेद अख्तर ने कहा कि ‘मानवता’ और ‘विवेक’ किसी भी मजहब से पुराने हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इंसान को अच्छा होने के लिए स्वर्ग के लालच या नरक के डर की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

गाजा का जिक्र और ईश्वर की न्यायप्रियता

बहस उस समय और गंभीर हो गई, जब जावेद अख्तर ने गाजा में हो रही हिंसा का उदाहरण देते हुए ईश्वर की सर्वशक्तिमान और दयालु छवि पर सवाल उठाए। इस पर मुफ्ती शमाइल ने ‘मानवीय स्वतंत्र इच्छा’ (Free Will) का सिद्धांत सामने रखा और कहा कि दुनिया में होने वाले अत्याचार ईश्वर नहीं, बल्कि इंसान की गलतियों का नतीजा हैं।

सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं

इस डिबेट के वीडियो ने सोशल मीडिया पर लाखों-करोड़ों व्यूज बटोर लिए हैं। कई लोग इसे ‘सभ्य और बौद्धिक संवाद’ का बेहतरीन उदाहरण बता रहे हैं, तो कुछ इसे आस्था और तर्क के बीच वैचारिक टकराव के रूप में देख रहे हैं। बहस के बाद इंटरनेट पर ‘Atheism vs Theism’ को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

जीत-हार से परे एक जरूरी संवाद

यह बहस किसी एक पक्ष की जीत या हार नहीं थी। यह इस बात का प्रमाण रही कि लोकतांत्रिक समाज में आस्था और तर्क एक ही मंच पर बैठकर संवाद कर सकते हैं। जहां मुफ्ती शमाइल ने आस्था को तर्क से जोड़ने की कोशिश की, वहीं जावेद अख्तर ने तर्क को किसी भी अलौकिक दावे से ऊपर रखा। अंततः, यह चर्चा दर्शकों के लिए सवाल छोड़ गई—क्या सत्य केवल वही है जो प्रमाणित हो, या वह भी जो महसूस किया जाता है?

manoj Gurjar
Author: manoj Gurjar

मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।

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