। राजस्थान कांग्रेस में ‘संगठन सृजन अभियान’ के तहत चल रहे पुनर्गठन की प्रक्रिया में मंगलवार को जोधपुर में बवाल खड़ा हो गया। शहर जिलाध्यक्ष की नियुक्ति के लिए आयोजित कार्यकर्ताओं की बैठक में वार्ड 72 के पार्षद प्रभुसिंह राठौड़ भड़क गए और उन्होंने नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठाते हुए जिलाध्यक्ष पद के लिए चुनाव की मांग की।
“पांच साल में एक बार नहीं मिले मुख्यमंत्री”
बैठक के दौरान पार्षद प्रभुसिंह राठौड़ ने आरोप लगाया, “मैं अशोक गहलोत की विधानसभा से कांग्रेस का पार्षद हूं…फिर भी मुझे पिछले पांच साल में एक बार भी अशोक गहलोत से मिलवाया नहीं गया, जबकि मेरे वार्डवासी परेशानियों से घिरे हुए हैं।” उन्होंने कहा कि जनता की समस्याओं को लेकर नेताओं तक पहुंच न बना पाना कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी समस्या है।
“अब नहीं चलेगा एक लाइन का प्रस्ताव”
राठौड़ ने पार्टी के भीतर लोकतंत्र की कमी पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने कांग्रेस उत्तर के जिलाध्यक्ष सलीम खान के उस बयान का विरोध किया, जिसमें उन्होंने ‘एक लाइन का प्रस्ताव’ पारित करने की बात कही थी। राठौड़ ने जोर देकर कहा, “अब उत्तर के जिलाध्यक्ष सलीम खान मंच से कहते हैं कि एक लाइन का प्रस्ताव पारित करेंगे कि जो गहलोत साब कहेंगे वो करेंगे…लेकिन यह सही नहीं है। हम चाहते है कि जिलाध्यक्ष का चुनाव हो। अब एक लाइन का प्रस्ताव नहीं चलेगा।” उन्होंने आगे कहा कि वैभव गहलोत की चुनावी हार का कारण भी यही ‘एक लाइन का प्रस्ताव’ और नाराज कार्यकर्ता थे। उनका कहना था कि इस तरह के फैसलों का खामियाजा पार्टी को बार-बार भुगतना पड़ता है।
माहौल तनावपूर्ण, बीच-बचाव करना पड़ा
पार्षद के इन विवादित बयानों के बाद बैठक का माहौल इतना गर्म हो गया कि वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को बीच-बचाव करके उन्हें शांत करना पड़ा। इस घटना के बाद बैठक जल्दी ही समाप्त कर दी गई।
पारदर्शी प्रक्रिया का दावा
बैठक की अध्यक्षता कर रहे केंद्रीय पर्यवेक्षक सुशांत मिश्रा ने मामला शांत करते हुए कहा कि जिलाध्यक्ष की नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से होगी। हालांकि, उन्होंने चुनाव की मांग पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की।
जिलाध्यक्ष सलीम खान ने क्या कहा?
वहीं, कांग्रेस उत्तर के जिलाध्यक्ष सलीम खान से जब इस पूरे मामले पर बात की गई तो उन्होंने कहा कि उन्होंने सिर्फ पार्टी की परंपरा का जिक्र किया था, लेकिन कोई प्रस्ताव पारित नहीं करवाया गया। उन्होंने दावा किया, “मैंने तो मंच से कहा कि यह परंपरा रही है… लेकिन हमने ऐसा कोई प्रस्ताव पारित किया तो नहीं है। पार्षद की समस्या है। इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।”
निष्कर्ष: जोधपुर की यह घटना राजस्थान कांग्रेस में मौजूद आंतरिक मतभेदों और कार्यकर्ताओं में व्याप्त असंतोष को एक बार फिर उजागर करती है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने अब यह बड़ी चुनौती है कि वह कार्यकर्ताओं की बढ़ती बेचैनी को कैसे दूर करती है और संगठन को एकजुट रखती है।
Author: manoj Gurjar
मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।








