सूरत की कपड़ा फैक्टरियों से 91 बाल मजदूर मुक्त, 86 बच्चे राजस्थान के जनजातीय इलाकों से

राजस्थान और गुजरात पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में सूरत की कपड़ा फैक्टरियों में चल रहे बाल मजदूरी रैकेट का बड़ा खुलासा हुआ है। छापेमारी के दौरान कुल 91 बाल मजदूरों को मुक्त कराया गया, जिनमें 86 बच्चे राजस्थान के बताए जा रहे हैं। कार्रवाई में शामिल गैर सरकारी संगठन Gayatri Seva Sansthan के निदेशक Dr. Shailendra Pandya ने बताया कि सरकार, पुलिस प्रशासन और सामाजिक संगठनों की संयुक्त कार्रवाई के तहत सूरत की तीन कपड़ा फैक्टरियों पर छापे मारे गए।

7 से 14 साल तक के बच्चे मिले फैक्टरियों में

मुक्त कराए गए बच्चों की उम्र 7 से 14 वर्ष के बीच बताई गई है। छापेमारी की भनक लगते ही फैक्टरी मालिक मौके से फरार हो गए।बताया गया कि ज्यादातर बच्चे राजस्थान के जनजातीय इलाकों से लाए गए थे। इसके अलावा तीन बच्चे उत्तर प्रदेश, जबकि एक-एक बच्चा झारखंड और बिहार का मिला। सभी बच्चों को Child Welfare Committee Surat के समक्ष पेश किया गया है और मामले में कानूनी कार्रवाई की जा रही है। मुक्त कराए गए बच्चों में 8 और 10 साल के दो सगे भाई भी शामिल हैं, जिन्हें राजस्थान के Udaipur जिले से लाया गया था। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि बच्चों को बहला-फुसलाकर या घूमाने के नाम पर सूरत लाया गया और बाद में उनसे फैक्टरियों में मजदूरी कराई गई।

महीनेभर से चल रही थी निगरानी

Gayatri Seva Sansthan पिछले एक महीने से इन फैक्टरियों की निगरानी कर रहा था। जांच में बड़ी संख्या में बाल मजदूरों की पुष्टि होने के बाद मामले की जानकारी National Commission for Protection of Child Rights को दी गई। इसके बाद संयुक्त कार्रवाई की गई, जिसमें एनसीपीसीआर, एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, राजस्थान पुलिस के 22 अधिकारी, सूरत पुलिस के पूना थाना अधिकारी और Association for Voluntary Action भी शामिल रहे। मुक्त कराए गए बच्चों ने पुलिस को अन्य स्थानों की भी जानकारी दी, जहां बाल मजदूरी कराई जा रही थी। डॉ. शैलेंद्र पंड्या ने बताया कि बच्चे पुलिस टीम को एक बंद इमारत तक ले गए, जहां अंदर छोटे-छोटे बच्चों से काम कराया जा रहा था। उन्होंने बताया कि वहां सात साल तक के बच्चे 12-12 घंटे की शिफ्ट में काम कर रहे थे और सभी बेहद डरे हुए तथा थके हुए थे।

Dr. Shailendra Pandya ने बताया कि एक आठ वर्षीय बच्चे के पास पहनने के लिए शर्ट तक नहीं थी। वह दूसरे बच्चों के पीछे छिपकर उनसे कुछ देर के लिए शर्ट मांग रहा था। उन्होंने कहा कि पुलिस और सभी संबंधित एजेंसियों की त्वरित कार्रवाई के कारण इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को सुरक्षित निकाला जा सका।

बाहर से बंद रहती थीं इमारतें

प्रारंभिक जांच में पता चला है कि फैक्टरी संचालकों ने संदेह से बचने के लिए बच्चों को सुबह-सुबह इमारतों में पहुंचाया जाता था और फिर दरवाजे बाहर से बंद कर दिए जाते थे। शाम को काम खत्म होने के बाद ही दरवाजे खोले जाते थे। बच्चों को आसपास की कॉलोनियों में बेहद खराब परिस्थितियों में रखा जाता था, जहां एक छोटे कमरे में 10 से 12 बच्चे रहते थे। कुछ बच्चों ने बताया कि उनके माता-पिता को मजदूरी के बारे में जानकारी थी, जबकि कई छोटे बच्चों को घूमाने के बहाने यहां लाया गया था। जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ बच्चे पिछले तीन-चार वर्षों से इन इकाइयों में काम कर रहे थे।

manoj Gurjar
Author: manoj Gurjar

मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।

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