NCERT की कक्षा 9 की किताब में शामिल हुई इमरजेंसी, सियासी घमासान तेज; विपक्ष ने उठाए सवाल

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने पहली बार कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में 1975-77 की इमरजेंसी को शामिल किया है। इमरजेंसी लागू होने के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसे पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। हालांकि, NCERT के इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस शुरू हो गई है। विपक्षी दलों ने इसे इतिहास को राजनीतिक नजरिए से पेश करने की कोशिश बताया है, जबकि भाजपा और उसके सहयोगी दल इसे नई पीढ़ी को लोकतंत्र के महत्वपूर्ण अध्याय से अवगत कराने की पहल मान रहे हैं।

संजय राउत बोले- पिछले 12 सालों पर भी होनी चाहिए चर्चा

शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने NCERT के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि देश में पिछले 12 वर्षों के हालात पर भी चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी केवल इतिहास का विषय नहीं है, बल्कि संविधान में भी इसकी व्यवस्था की गई है। राउत ने कहा कि संविधान प्रधानमंत्री को विशेष परिस्थितियों में इमरजेंसी लगाने का अधिकार देता है। उन्होंने नोटबंदी जैसे फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विभिन्न निर्णय संवैधानिक प्रावधानों के तहत लिए जाते हैं।

कांग्रेस ने लगाया राजनीति का आरोप

कांग्रेस नेता जयवर्धन सिंह ने भाजपा पर शिक्षा व्यवस्था में राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि देश के युवा बेहतर शिक्षा और रोजगार चाहते हैं, लेकिन सरकार बच्चों की पाठ्यपुस्तकों को राजनीतिक बहस का माध्यम बना रही है। उनका कहना था कि कांग्रेस ने लंबे समय तक शासन किया, लेकिन कभी शिक्षा को राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं बनाया।

सचिन पायलट ने संस्थाओं के दुरुपयोग का मुद्दा उठाया

कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा कि भाजपा सरकार इतिहास को अपने नजरिए से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा है और विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। पायलट ने कहा कि लोकतंत्र के सामने खड़ी चुनौतियों पर भी व्यापक चर्चा होनी चाहिए।कर्नाटक के पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता मधु बंगारप्पा ने कहा कि बच्चों की शिक्षा में वैचारिक प्रभाव डालने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि पाठ्यपुस्तकों में सांस्कृतिक विविधता और क्षेत्रीय पहचान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने पाठ्यक्रम निर्माण प्रक्रिया में राज्यों की भागीदारी बढ़ाने की भी मांग की।

जेडीयू ने बताया लोकतंत्र का काला अध्याय

जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद संजय कुमार झा ने इमरजेंसी को भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला दौर बताया। उन्होंने कहा कि उस समय विपक्षी नेताओं और पत्रकारों को जेल भेजा गया था तथा प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंध लगाए गए थे। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों को व्यापक रूप से प्रभावित किया गया था और इस विषय को नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है। दिल्ली सरकार में मंत्री आशीष सूद ने कहा कि नई पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि घोषित और अघोषित इमरजेंसी में क्या अंतर होता है। उनके अनुसार लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को समझाने के लिए इस विषय का अध्ययन जरूरी है। आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने कहा कि सत्ता में रहने वाली सरकारें अपने दृष्टिकोण के अनुसार इतिहास प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक परिवर्तन के साथ पाठ्यक्रमों में बदलाव होना असामान्य नहीं है।

क्या थी 1975 की इमरजेंसी?

भारत में 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया था, जो 21 मार्च 1977 तक प्रभावी रहा।

इमरजेंसी के दौरान:

  • कई मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए।
  • प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई।
  • विपक्षी नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं।
  • सरकार विरोधी गतिविधियों पर कड़ी कार्रवाई की गई।
  • परिवार नियोजन अभियान को बड़े पैमाने पर चलाया गया।
  • 42वां संविधान संशोधन पारित किया गया।
  • केंद्र सरकार की शक्तियों का विस्तार किया गया।

इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र के सबसे विवादास्पद अध्यायों में से एक मानी जाती है और इसके प्रभावों को लेकर आज भी राजनीतिक और वैचारिक बहस जारी है।

manoj Gurjar
Author: manoj Gurjar

मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।

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