दिल्ली में SIR से वोटर लिस्ट से नाम कटा, फिर उजड़ी झुग्गी; माया देवी बोलीं- पहले वोट गया, फिर घर भी चला गया

नई दिल्ली: दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 में रहने वाली 58 वर्षीय माया देवी की कहानी मतदाता सूची में नाम कटने और झुग्गी टूटने के बाद पैदा हुई मुश्किलों को सामने लाती है। घरेलू सहायिका माया देवी का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से उनका और उनकी दो बेटियों का नाम हटा दिया गया, जबकि उनके पति और बेटे का नाम अब भी सूची में दर्ज है। झुग्गी टूटने के बाद परिवार के पांच सदस्यों को मेट्रो स्टेशन के पास पिलर नंबर-1 के नजदीक एक छोटे से कमरे में रहने को मजबूर होना पड़ा है। माया देवी ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, “पहले वोट गया, फिर झुग्गी भी चली गई।” द टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में दोबारा नाम जुड़वाने के लिए उन्होंने बूथ लेवल अधिकारी (BLO) से फोन पर संपर्क किया और फॉर्म भरने में मदद मांगी, लेकिन अधिकारी उनके पास नहीं पहुंचे। माया देवी का कहना है कि वह 13 साल की उम्र से दिल्ली में रह रही हैं और 2025 के विधानसभा चुनाव सहित हर चुनाव में मतदान करती रही हैं। गुरुवार को आयोजित एक जनसुनवाई में उन्होंने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की शिकायत रखी। उनके अलावा कई अन्य लोगों ने भी दावा किया कि जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।

पूर्व न्यायाधीशों के आयोग के सामने लोगों ने रखीं शिकायतें

SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए एक स्वतंत्र आयोग ने जनसुनवाई आयोजित की। इसकी अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश ए.के. पटनायक, रेखा शर्मा और अंजना प्रकाश ने की। जनसुनवाई में दिल्ली के अलावा पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, बिहार और राजस्थान से आए लोगों ने अपनी शिकायतें रखीं। इनमें पूर्व सांसद, शिक्षक और आम मतदाता शामिल थे। शिकायतकर्ताओं ने नाम हटाने की प्रक्रिया, दस्तावेजों की जांच और मतदाता सूची में नाम दोबारा दर्ज कराने में आ रही परेशानियों को लेकर सवाल उठाए।

दिल्ली में 47 लाख से अधिक नाम हटाए जाने का दावा

जनसुनवाई में ‘वोटर अधिकार मंच’ और ‘जन सरोकार’ के प्रतिनिधियों ने दिल्ली में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का मुद्दा उठाया। उनके मुताबिक, जनवरी 2025 की मतदाता सूची में 1.5 करोड़ से अधिक मतदाता दर्ज थेप्रतिनिधियों ने दावा किया कि जनवरी से जून 2026 के बीच मासिक संशोधनों के दौरान करीब 11 लाख नाम हटाए गए। इसके बाद 31 अगस्त को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची से 47 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम और हटाए जाने की बात कही गई।

जनसुनवाई में इन आंकड़ों के आधार पर नाम हटाने की प्रक्रिया और इससे प्रभावित लोगों की स्थिति पर चिंता जताई गई। शिकायतकर्ताओं ने सवाल किया कि लंबे समय से मतदान करते आ रहे लोगों को सूची से बाहर किए जाने के पीछे क्या कारण थे और वे अपने नाम दोबारा दर्ज कराने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाएं।

पूर्व सांसद तरुण मंडल ने पूछा- क्या मैं बांग्लादेशी हूं?

पश्चिम बंगाल के पूर्व लोकसभा सांसद तरुण मंडल ने भी मतदाता सूची से अपना नाम हटाए जाने की शिकायत की। उन्होंने कहा कि उनके परिवार ने नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया पूरी की थी, इसके बावजूद उनका नाम सूची में नहीं मिला।

मंडल के मुताबिक, उन्होंने इस मामले में प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक को पत्र लिखकर अपनी शिकायत पहुंचाई। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि वह भारत के मतदाता नहीं थे, तो सांसद कैसे बने? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या नाम हटाए जाने का मतलब यह है कि वह बांग्लादेशी हैं।

मंडल ने बताया कि उनके पत्रों में से केवल राष्ट्रपति की ओर से जवाब मिला। उनका मामला जनसुनवाई में मतदाता पहचान और सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों में शामिल रहा।

500 से अधिक फॉर्म जमा करने के बाद भी नाम जुड़ने का इंतजार

बेला एस्टेट के शिक्षक कमाल ने भी अपनी शिकायत रखते हुए बताया कि वह 2002 से मतदान कर रहे हैं और पिछले साल भी उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज था। उन्होंने कहा कि उनका जन्म 1986 में हुआ था, जबकि उनके दादा 1913 में यहां आए थे। उनके पिता की उम्र करीब 70 साल है।

कमाल का दावा है कि उनके परिवार की ओर से 500 से अधिक नामांकन फॉर्म जमा किए गए, इसके बावजूद उन्हें अतिक्रमणकारी बताया जा रहा है। उनकी शिकायत ने दस्तावेजों की जांच, नागरिक पहचान और मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए।

AI से ‘लॉजिकल विसंगतियां’ पहचानने की प्रक्रिया पर सवाल

जनसुनवाई में मतदाताओं की पात्रता की जांच के दौरान इस्तेमाल की जा रही कथित ‘लॉजिकल विसंगतियों’ पर भी चर्चा हुई। इनमें परिवार में भाई-बहनों की संख्या और माता-पिता तथा बच्चों के बीच उम्र का अंतर जैसी बातें शामिल हैं।

‘वोटर अधिकार मंच’ के निष्कर्षों के हवाले से दावा किया गया कि दिल्ली और कर्नाटक में नोटिस जारी करने के चरण में ऐसी विसंगतियों के आधार पर मुस्लिम मतदाताओं को अपेक्षाकृत अधिक चिह्नित किया गया।

पश्चिम बंगाल में नागरिक ऑडिट करने वाले साबिर अहमद ने कहा कि इन विसंगतियों की पहचान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल करते समय सामाजिक परिस्थितियों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया। उन्होंने कम उम्र में विवाह और मातृत्व जैसी वास्तविकताओं का जिक्र करते हुए कहा कि केवल आंकड़ों के आधार पर किसी मतदाता की पात्रता पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

मतदाता सूची से नाम हटने के असर पर उठे सवाल

जनसुनवाई में सामने आई शिकायतों ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया, दस्तावेजों की जांच और प्रभावित लोगों के लिए उपलब्ध समाधान को लेकर बहस तेज कर दी है। माया देवी जैसे लोगों के लिए यह मामला केवल मतदान के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी और असुरक्षा से भी जुड़ा है।

हालांकि, जनसुनवाई में रखे गए आंकड़े और आरोप संबंधित संगठनों तथा शिकायतकर्ताओं के दावे हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि और प्रत्येक मामले में नाम हटाए जाने के कारणों की जांच जरूरी है।

manoj Gurjar
Author: manoj Gurjar

मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।

Leave a Comment