हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त जज की बर्खास्तगी रद्द की, परिवार को मिलेगा पूरा वेतन और पेंशन लाभ

जोधपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने बीकानेर निवासी सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश स्वर्गीय बी.डी. सारस्वत की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण और जस्टिस बिपिन गुप्ता की पीठ ने न केवल बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त किया है, बल्कि उनके परिवार को पूर्ण वेतन, सेवा निरंतरता और पेंशन लाभ देने का भी आदेश दिया है। गौरतलब है कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही साल 2012 में जस्टिस सारस्वत का निधन हो गया था।

जांच प्रक्रिया में पाए गए दोष

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जांच अधिकारी की रिपोर्ट और पूर्ण पीठ का निर्णय दोषपूर्ण और बाहरी साक्ष्यों पर आधारित था, जिसे किसी भी विवेकशील व्यक्ति द्वारा उचित नहीं कहा जा सकता। पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 311(2) के तहत, जांच पूरी होने के बाद दंड उसी आधार पर लगाया जा सकता है और राज्यपाल स्तर पर दोबारा सुनवाई का प्रावधान बाध्यकारी नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला तब शुरू हुआ जब जस्टिस सारस्वत प्रतापगढ़ में एनडीपीएस विशेष न्यायाधीश के रूप में तैनात थे। अधिवक्ता अशोक कुमार वैष्णव ने आरोप लगाया था कि सारस्वत ने एक अभियुक्त पारस को बिना किसी नई परिस्थिति या आरोपपत्र दाखिल हुए ही जमानत दे दी, जबकि पहले दो बार यह याचिका खारिज हो चुकी थी। आरोप था कि यह कार्रवाई अनुचित उद्देश्य या बाहरी प्रभाव का नतीजा थी।

इस आरोप के बाद, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने जस्टिस एन.पी. गुप्ता को जांच अधिकारी नियुक्त किया। जांच में लोक अभियोजक द्वारकानाथ शर्मा और अधिवक्ता वैष्णव के बयान लिए गए। जांच अधिकारी ने गंभीर कदाचार मानते हुए आरोप को सही पाया और पूर्ण पीठ ने इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए 8 अप्रैल 2010 को राज्यपाल से बर्खास्तगी का आदेश जारी करवाया।

परिवार को मिलेगा पूरा लाभ

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि सेवा समाप्ति अवैध पाई गई है, इसलिए सामान्य नियम के तहत पुनर्स्थापना और संपूर्ण बकाया वेतन दिया जाना आवश्यक है। राज्य सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि यह मामला इस सामान्य नियम का अपवाद है। इस आधार पर, अदालत ने आदेश दिया कि जस्टिस सारस्वत के परिजनों को 8 अप्रैल 2010 से 28 फरवरी 2011 तक का पूरा वेतन और सेवा निरंतरता के साथ सभी संबंधित लाभ दिए जाएं।

मुकदमे के दौरान हुआ निधन

मूल रूप से बीकानेर के रहने वाले जस्टिस सारस्वत का यह मामला लंबित रहने के दौरान 26 मई 2012 को निधन हो गया। उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी ने कोर्ट में यह लड़ाई जारी रखी। बाद में पत्नी के भी निधन के पश्चात, उनके बीकानेर निवासी पुत्र अमित सारस्वत और पुत्री मधु सारस्वत ने याचिका को आगे बढ़ाया और अब उन्हें यह न्यायिक सफलता मिली है।

manoj Gurjar
Author: manoj Gurjar

मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।

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