राजस्थान की सियासत में आज बड़ा भूचाल आया जब हाईकोर्ट ने बारां जिले की अंता विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक कंवरलाल मीणा की तीन साल की सजा को बरकरार रखा। अदालत ने उनकी निगरानी याचिका खारिज करते हुए उन्हें तुरंत निचली अदालत में सरेंडर करने का निर्देश दिया है। इस फैसले के बाद अब उनकी विधानसभा सदस्यता पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं।
20 साल पुराना मामला
यह मामला फरवरी 2005 का है, जब खताखेड़ी गांव में उप सरपंच के चुनाव को लेकर विवाद के दौरान मीणा पर उपखंड अधिकारी को रिवॉल्वर दिखाकर धमकाने और पुनर्मतदान की मांग करने का आरोप लगा था। इस घटना के बाद मनोहरथाना थाने में एफआईआर दर्ज हुई थी। 2018 में एक निचली अदालत ने मीणा को बरी कर दिया था, लेकिन 2020 में सत्र न्यायालय ने इस फैसले को पलटते हुए उन्हें दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें तीन अलग-अलग धाराओं में कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई:
-
पीडीपीपी एक्ट के तहत: 3 साल का कठोर कारावास व ₹10,000 जुर्माना
-
धारा 506 (आपराधिक धमकी): 3 साल का कठोर कारावास व ₹10,000 जुर्माना
-
धारा 353 (सरकारी कार्य में बाधा): 2 साल का कठोर कारावास व ₹5,000 जुर्माना
सदस्यता पर खतरा
भारतीय सुप्रीम कोर्ट के 2013 के लीली थॉमस बनाम भारत सरकार मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, यदि किसी सांसद या विधायक को दो साल या उससे अधिक की सजा होती है, तो उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाती है। ऐसे में मीणा की विधायक सदस्यता पर तलवार लटक रही है, जब तक कि कोई उच्च अदालत उनकी सजा पर रोक नहीं लगाती।
सियासी हलचल तेज
इस मामले के ताजा घटनाक्रम ने राजस्थान की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर बीजेपी पर हमलावर हो सकता है, वहीं पार्टी के भीतर भी दबाव बढ़ सकता है कि मीणा की सदस्यता समाप्त होने की स्थिति में आगे की रणनीति क्या हो।

Author: manoj Gurjar
मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।