
राजसमन्द। 17 मार्च । गणगौर राजस्थान का प्रसिद्ध त्यौहार है। गण यानी शिव और गौर मतलब गौरी माता पार्वती से है। दोनों शब्दों से मिलकर बनता है गणगौर। यह पर्व होली के 15 दिन बाद मनाया जाता है। सदियों से मेवाड़ में इसे विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है।
होली खेलने के बाद से मेवाड़ में कुंवारी कन्याओं द्वारा सेवरा लाने की परंपरा है। सूर्योदय से पूर्व यह कन्याएं गीत गाती हुई आसपास के बगीचे या उद्यान तक पहुंचती है। अपने साथ ले गए कलश में फूल पत्तियां सजा कर माता गौरी का पूजन करती है। वहां से ढोल अथवा बैंड की धुन पर नाचते गाते माता पार्वती के भजन गाकर अपने घरों तक लौट आई है और वहां मिट्टी से बने ईश्वर और पार्वती की मूर्तियों की आरती और पूजन किया जाता है।
मान्यता है यह पूजन कुमारी कन्याओं द्वारा किए जाने से उन्हें भगवान शिव जैसे मनचाहे वर की प्राप्ति होती है और घर में सुख समृद्धि बनी रहती है। शाम को सूर्य से पूर्व यह महिलाएं सच-सावरकर सेवर लाने निकलती है और वापस घर लौटने पर घर के द्वार पर ईश्वर पार्वती के समझ झाला नृत्य किया जाता है । कांकरोली में यह परंपरा करीब 350 साल से चली आ रही। कहा जाता है जब भगवान द्वारकाधीश मथुरा से कांकरोली पधारे थे उस समय मंदिर के चौक में गणगौर पूजन के बाद झाला नृत्य किया जाता था। पिछले तीन-चार दशक से यह आयोजन नगर परिषद द्वारा किया जा रहा है। जिसके चलते यह महिलाएं पारंपरिक चुनरी और श्रृंगार के साथ तैयार होकर सेवरा लेकर आती है और इसके बाद मेला स्थल पर ईसर और माता पार्वती की मूर्तियों को बीच में विराजित कर उसके चारों ओर झाला देकर गीत गाती है।
इन गीतों के साथ ही परिवार में सुख समृद्धि और पति-पत्नी के आपसी स्नेह की कामना की जाती है। होली से शुरू हुआ यह क्रम गणगौर तक लगातार जारी रहता है।महिलाओं के इस पर्व को लेकर कुवारी कन्याओं और विवाहित महिलाओं में जोरदार उत्साह बना रहता है।








