जयपुर। राजस्थान की राजनीति में बोर्ड, आयोग और अकादमियां लंबे समय से राजनीतिक लाभ और सामाजिक समीकरण साधने का जरिया बन गए हैं। प्रदेश में 40 से अधिक ऐसे बोर्ड और आयोग हैं, लेकिन इनमें नियुक्तियां ज्यादातर चुनाव नजदीक आने पर ही होती हैं। विश्लेषकों का कहना है कि इन संस्थाओं को वास्तविक कार्य के बजाय राजनीतिक नियुक्तियों का ठिकाना बना दिया गया है।
चुनावी सालों में तेज होती है नियुक्तियों की दौड़
आमतौर पर सरकारें अपने कार्यकाल के आखिरी दो-तीन वर्षों में इन बोर्ड और आयोगों में नियुक्तियां करती हैं। चुनाव से ठीक पहले समाजों को साधने के लिए अलग-अलग जाति वर्गों के नाम पर आयोगों की घोषणाएं होती हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश आयोग आज भी सिर्फ कागजों तक सीमित हैं और समाजों को व्यावहारिक लाभ नहीं मिल पाया है।
कोर्ट भी जता चुका है चिंता
राजस्थान हाईकोर्ट पहले ही इन बोर्ड और आयोगों में पद खाली रहने पर चिंता जता चुका है। कोर्ट ने कहा था कि इन्हें लंबे समय तक खाली न रखा जाए और नियुक्तियों की जानकारी नियमित रूप से सरकारी वेबसाइट पर अपडेट की जाए।
कांग्रेस सरकार का उदाहरण
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में करीब 36 नए बोर्ड और आयोगों की घोषणाएं हुईं। इनमें लगभग हर समाज-जाति वर्ग को साधने की कोशिश की गई। यहां तक कि आचार संहिता लागू होने से कुछ दिन पहले तक घोषणाएं होती रहीं।
इनमें से ज्यादातर नियुक्तियां स्थायी प्रकृति के बोर्ड-आयोगों में हुई थीं। करीब 70 अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनाए गए थे। इनमें से 35 को मंत्री का दर्जा दिया गया, जबकि 4 को कैबिनेट और 31 को राज्यमंत्री का दर्जा देकर सुविधाएं दी गईं। कई नियुक्तियां इतनी देर से हुईं कि वे पदभार ग्रहण भी नहीं कर सके।
समाज-जाति आधारित बोर्ड
पूर्ववर्ती सरकार ने अलग-अलग समाजों के लिए महात्मा ज्योतिबा फुले बोर्ड (माली समाज), रजक कल्याण बोर्ड (धोबी समाज), गाड़िया लोहार कल्याण बोर्ड, अवंति बाई लोधी बोर्ड, लव-कुश बोर्ड, अहिल्याबाई होल्कर बोर्ड, सरदार पटेल कल्याण बोर्ड, अग्रसेन बोर्ड, वाल्मीकि बोर्ड, कायस्थ बोर्ड, मेघवाल बोर्ड समेत दर्जनों बोर्ड बनाए। लेकिन इनका लाभ अब तक अधिकांश समाजों तक नहीं पहुंच पाया।
सुधार की दरकार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बोर्ड और आयोगों को केवल चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करना जनता के साथ धोखा है। यदि इन संस्थाओं को समयबद्ध नियुक्तियों और वास्तविक कार्यों के लिए सक्रिय किया जाए, तो समाजों को सीधा और ठोस लाभ मिल सकता है।
Author: manoj Gurjar
मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।







