बिहार में साल के अंत में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर बड़ा राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा जारी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) के तहत लाखों नामों के हटाए जाने के फैसले ने राज्य की सियासत को गरमा दिया है। इस मामले पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जहां शीर्ष अदालत ने फिलहाल एसआईआर की मसौदा सूची पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
प्रशांत किशोर का चुनाव आयोग पर हमला
जन सुराज पार्टी के संस्थापक और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग यह स्पष्ट नहीं कर पा रहा है कि किन लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं। यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और जनता के अधिकारों का हनन हो रहा है। हमें सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद है।”
संसद में विपक्ष का विरोध-प्रदर्शन
एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ विपक्षी दलों ने सोमवार को संसद परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया। इस विरोध में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत इंडी गठबंधन के कई प्रमुख नेता शामिल हुए। खड़गे ने कहा, “एसआईआर एकतरफा और पक्षपातपूर्ण प्रक्रिया है, जिससे निष्पक्ष चुनाव की नींव हिल सकती है। यह सीधे तौर पर वोटिंग का अधिकार छीनने की साजिश है। संसद में इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।”
65 लाख वोटर सूची से बाहर
चुनाव आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, विशेष पुनरीक्षण के पहले चरण में करीब 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। आयोग का तर्क है कि ये वो लोग हैं जो या तो अब इस दुनिया में नहीं हैं या स्थायी रूप से बिहार से बाहर जा चुके हैं। हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि यह आंकड़े मनमाने हैं और जांच के नाम पर लाखों वास्तविक मतदाताओं को अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
चुनावी माहौल गरम, जनभावनाएं सतह पर
जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो रही है, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और जनअभियान तेज होते जा रहे हैं। जहां एक ओर विपक्ष मतदाता सूची की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर रहा है, वहीं सत्ताधारी दल इस कवायद को “सिस्टम को शुद्ध करने” की दिशा में जरूरी कदम बता रहे हैं।
निष्कर्षतः, मतदाता सूची से जुड़े इस विवाद ने बिहार की चुनावी राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया है। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग इस संवेदनशील मुद्दे पर आगे क्या रुख अपनाते हैं और इससे आगामी चुनावों की पारदर्शिता पर क्या असर पड़ता है।

Author: manoj Gurjar
मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।