बद्रीनाथ धाम चढ़ावा घोटाला: SIT के हाथ लगा ‘डिजिटल सच’, क्या खुलेगा हेराफेरी का राज?

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई के दौरान एक भावुक घटनाक्रम देखने को मिला, जब चंडीगढ़ की एक महिला अधिवक्ता ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत के समक्ष अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए न्यायालय से तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई। महिला वकील ने दावा किया कि वह लंबे समय से उत्पीड़न का सामना कर रही हैं और उनके मामले में कोई भी अधिवक्ता उनका पक्ष रखने के लिए तैयार नहीं हो रहा। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि केवल मौखिक अनुरोध के आधार पर अदालत स्वतः संज्ञान (Suo Motu) नहीं ले सकती और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली महिला वकील ने कोर्ट को बताया कि भय और दबाव के माहौल के कारण उन्हें कानूनी सहायता मिलने में कठिनाई हो रही है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि उनके मामले में स्वतः संज्ञान लेकर हस्तक्षेप किया जाए। अदालत में अपनी बात रखते समय वह भावुक हो गईं और उनकी आवाज में निराशा साफ दिखाई दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उनकी बात ध्यानपूर्वक सुनी, लेकिन कहा कि न्यायिक व्यवस्था में प्रत्येक मामले के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। उन्होंने महिला वकील को सलाह दी कि यदि उन्हें किसी प्रकार की शिकायत या राहत चाहिए तो वह संबंधित हाईकोर्ट में विधिवत याचिका दाखिल करें। CJI ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट हर मामले में सीधे स्वतः संज्ञान नहीं ले सकता और पहले उपलब्ध वैधानिक उपायों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी दोहराया कि हाईकोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों के समाधान के लिए सक्षम मंच है और न्यायिक प्रणाली की प्रत्येक संस्था की अपनी भूमिका और जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न्यायिक प्रक्रिया और संस्थागत व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसी दिन मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तराखंड हाईकोर्ट से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण मामले की भी सुनवाई की। अदालत ने नैनीताल से हाईकोर्ट की बेंच को अन्य स्थान पर स्थानांतरित करने के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने संबंधी उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। यह मामला हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की अपील पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।

सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत ने टिप्पणी की कि न्यायिक मामलों में इस प्रकार के आदेश देना हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। उन्होंने कहा कि अदालतों के बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों का समाधान प्रशासनिक स्तर पर राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन के समन्वय से किया जाना चाहिए। पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि राज्य सरकार ने हल्द्वानी क्षेत्र में हाईकोर्ट के लिए भूमि चिह्नित कर दी है। अदालत ने निर्देश दिया कि आवश्यक प्रशासनिक और वैधानिक मंजूरियां छह सप्ताह के भीतर पूरी कर भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए, ताकि न्यायिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में कार्य तेजी से हो सके।

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Author: manoj Gurjar

मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।

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