तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अभिनेता-व राजनेता विजय के नेतृत्व में नई टीवीके सरकार बनने के बाद विपक्षी दल AIADMK में अंदरूनी संकट गहराता जा रहा है। इसी बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता और दो बार लोकसभा सांसद रहे Dr. P. Venugopal ने रविवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया। डॉ. वेणुगोपाल का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब AIADMK लगातार चुनावी हार, नेतृत्व संकट और वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी से जूझ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्तीफा पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।
लगातार पार्टी छोड़ रहे वरिष्ठ नेता
पिछले कुछ हफ्तों में AIADMK के कई पुराने और प्रभावशाली नेताओं ने पार्टी से दूरी बना ली है। पूर्व मंत्री एस सेम्मलाई और पूर्व विधानसभा स्पीकर पी धनपाल के बाद अब डॉ. वेणुगोपाल का जाना पार्टी में बढ़ती असंतोष की भावना को दर्शाता है। डॉ. वेणुगोपाल तिरुवल्लुर लोकसभा सीट से दो बार सांसद रह चुके हैं। वह पार्टी के मेडिकल विंग के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे और लोकसभा में AIADMK संसदीय दल के नेता की भूमिका भी निभा चुके हैं। अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले वेणुगोपाल के इस्तीफे से पार्टी के दलित वोट बैंक पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
जयललिता के बाद कमजोर हुआ SC वोट बैंक
अपने इस्तीफे के दौरान डॉ. वेणुगोपाल ने कहा कि J. Jayalalithaa के निधन के बाद अनुसूचित जाति समुदाय का पार्टी से समर्थन लगातार कम हुआ है। उन्होंने कहा कि पार्टी को फिर से मजबूत करने के लिए सभी वर्गों और समुदायों को साथ लेकर चलने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पार्टी केवल कुछ नेताओं के इर्द-गिर्द नहीं चल सकती। उम्मीदवार चयन में गलत फैसले, वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी और राज्यसभा जैसी अहम सीटों पर नए चेहरों को प्राथमिकता देने जैसे मुद्दों पर भी उन्होंने सवाल उठाए।
एडप्पादी पलानीस्वामी की कार्यशैली पर सवाल
इस्तीफे के बाद डॉ. वेणुगोपाल ने अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी महासचिव Edappadi K. Palaniswami की नेतृत्व शैली पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि संगठनात्मक फैसलों और चुनावी रणनीति में अधिक समझदारी की आवश्यकता है। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के बीच यह भावना बढ़ रही है कि अनुभवी नेताओं को किनारे किया जा रहा है। वेणुगोपाल ने कहा कि जयललिता के समय वरिष्ठ नेताओं को सम्मान और जिम्मेदारी दोनों मिलती थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।
लगातार हार से बढ़ी मुश्किलें
जयललिता के निधन के बाद से AIADMK अपनी पुरानी राजनीतिक ताकत हासिल नहीं कर पाई है। लगातार चुनावी हार, द्रमुक और भाजपा जैसी पार्टियों से मुकाबले में पिछड़ना और अंदरूनी गुटबाजी ने पार्टी को कमजोर कर दिया है। अब आगामी चुनावों से पहले AIADMK के सामने संगठन को दोबारा मजबूत करने, अलग-अलग समुदायों को जोड़ने और पार्टी के भीतर एकजुट नेतृत्व तैयार करने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
Author: manoj Gurjar
मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।








