रूस से तेल खरीद पर भारत के लिए बढ़ा अमेरिकी टैरिफ का खतरा, हाउस में 214-211 से आगे बढ़ा बिल

नई दिल्ली: रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक तनाव का एक नया मोर्चा खुलता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर कड़े शुल्क लगाने की संभावनाओं वाले एक अहम प्रतिबंध विधेयक को अंतिम मतदान की दिशा में आगे बढ़ा दिया है। इस विधेयक के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कुछ देशों के सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। भारत और चीन उन प्रमुख देशों में शामिल हैं जिन पर इस प्रावधान का असर पड़ सकता है।

214-211 के करीबी अंतर से मिली मंजूरी

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में मंगलवार, 15 सितंबर को विधेयक पर आगे की प्रक्रिया के लिए हुए मतदान में प्रस्ताव 214-211 के अंतर से पारित हुआ। यह मतदान अंतिम कानून पारित करने का वोट नहीं था, बल्कि इसने विधेयक को सदन में अंतिम विचार और मतदान के लिए आगे बढ़ाने का रास्ता साफ किया। अंतिम मतदान 16 सितंबर को होने की प्रक्रिया तय हुई थी। इससे पहले अमेरिकी सीनेट अगस्त में इसी विधेयक को 86-11 के बड़े बहुमत से मंजूरी दे चुकी है।

क्या है रूस-ईरान प्रतिबंध विधेयक?

मामला Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 से जुड़ा है। इसका उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसकी ऊर्जा आय को प्रभावित करना है। प्रस्तावित कानून में रूस के अधिकारियों, ऊर्जा क्षेत्र और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले नेटवर्क पर कार्रवाई के साथ-साथ रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भी अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान है।

रिपोर्टों के अनुसार राष्ट्रपति को कुछ प्रमुख रूसी ऊर्जा खरीदार देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की शक्ति मिल सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत पर स्वतः 100 फीसदी शुल्क लागू हो जाएगा। विधेयक कानून बनने के बाद भी वास्तविक टैरिफ लगाने का निर्णय अलग प्रक्रिया और अमेरिकी प्रशासन के फैसले पर निर्भर करेगा।

भारत पर क्यों पड़ सकता है असर?

भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है और इसे देश की ऊर्जा जरूरतों के संदर्भ में महत्वपूर्ण आयात माना जाता है। इसी वजह से रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदारों पर प्रस्तावित अमेरिकी कार्रवाई में भारत का नाम चर्चा में है। चीन भी संभावित प्रभावित देशों में शामिल है।

यदि भविष्य में अमेरिकी प्रशासन भारत पर इस तरह का अतिरिक्त शुल्क लगाता है, तो इसका सीधा असर अमेरिका को निर्यात होने वाले भारतीय सामान की लागत और प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर पड़ सकता है। हालांकि, अभी यह केवल संभावित अधिकार का मामला है और वास्तविक शुल्क की दर तथा उसका दायरा आगे के निर्णयों पर निर्भर करेगा।

‘शैडो फ्लीट’ पर भी सख्ती

विधेयक में रूस के तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। ये ऐसे जहाज हैं जिन पर रूस के तेल निर्यात से जुड़े मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने के आरोप लगते रहे हैं। इसके अलावा रूस के ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र से जुड़े संस्थानों तथा अधिकारियों पर प्रतिबंधों को मजबूत करने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

भारत का रुख क्या है?

भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का फैसला देश की ऊर्जा सुरक्षा, उपलब्धता और आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता है। रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका की ओर से दबाव के बीच भारत और अमेरिका के बीच इस मुद्दे पर बातचीत भी जारी रही है।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम अमेरिकी प्रतिनिधि सभा का अंतिम मतदान है। यदि सदन विधेयक को मंजूरी देता है, तो इसके बाद यह राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए जा सकता है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि भारत समेत रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित नई टैरिफ व्यवस्था किस रूप में लागू होती है।

manoj Gurjar
Author: manoj Gurjar

मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।

Leave a Comment