नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दावा किया गया कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं और कुछ विधानसभा क्षेत्रों में जीत-हार का अंतर हटाए गए नामों की संख्या से भी कम रहा है। मामले में एक विशेष समुदाय को निशाना बनाए जाने का आरोप भी लगाया गया है।
कम अंतर से हारे उम्मीदवार, हजारों नाम हटाने का दावा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कुछ विधानसभा सीटों के आंकड़े अदालत के सामने रखे गए। दलील दी गई कि एक सीट पर चुनावी हार का अंतर महज 365 वोट था, जबकि वहां करीब 7,800 मतदाताओं के नाम हटाए गए। इसी तरह एक अन्य सीट पर जीत-हार का अंतर 469 वोट बताया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ऐसे मामलों में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुए बदलाव चुनावी नतीजों पर असर डाल सकते हैं। मुर्शिदाबाद जिले में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का मुद्दा अदालत के सामने उठाया गया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि नाम हटाने की प्रक्रिया से एक खास समुदाय प्रभावित हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा पूरा आंकड़ा
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग से अपीलों से जुड़े विस्तृत आंकड़े पेश करने को कहा है। पीठ में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत ने आयोग से यह बताने को कहा कि अपील ट्रिब्यूनल के सामने कुल कितने मामले लंबित हैं, कितनी अपीलों का निपटारा हो चुका है और कितने मामलों में मतदाता सूची में नाम हटाने या जोड़ने को लेकर आपत्ति दर्ज की गई है।
2029 लोकसभा चुनाव से पहले पूरी प्रक्रिया खत्म करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से जुड़े सभी मामलों का निपटारा 2029 के लोकसभा चुनाव से काफी पहले हो जाना चाहिए। अदालत ने चुनाव आयोग से यह भी जानकारी मांगी कि अपीलों के जल्द निपटारे के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, करीब 38 लाख अपीलें दाखिल की गई हैं। इनमें लगभग 7 लाख अपीलें उन लोगों की हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। बाकी करीब 31 लाख अपीलें नाम जोड़ने के विरोध या अन्य संबंधित मामलों से जुड़ी बताई गई हैं।
नाम कटे मतदाताओं की अपीलों को प्राथमिकता देने की मांग
सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, उनकी अपीलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि बड़ी संख्या में मामलों में अपील के बाद नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल हो जाते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में नगरपालिका चुनाव भी नजदीक हैं। ऐसे में अगर पात्र मतदाताओं के नाम समय पर सूची में नहीं जुड़े तो वे मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। अदालत ने भी इस चिंता को गंभीरता से लेते हुए कहा कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों का निपटारा चुनावों से पहले होना जरूरी है।
चुनाव आयोग ने कोर्ट को क्या बताया?
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील डीएस नायडू ने अदालत को बताया कि अपील ट्रिब्यूनलों के साथ बैठकें की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि पोर्टल से जुड़ी कुछ तकनीकी समस्याएं हैं और उन्हें दूर करने के लिए अगले सप्ताह तक सुझाव अदालत के सामने रखे जाएंगे। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि जिन मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़े जाते हैं, उनकी सप्लीमेंटरी मतदाता सूची जल्द जारी की जाए, ताकि आगामी नगरपालिका और पंचायत चुनावों में पात्र मतदाताओं को मतदान का अधिकार मिल सके। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद अब चुनाव आयोग को अपीलों की स्थिति, लंबित मामलों और मतदाता सूची में नाम दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया से जुड़े आंकड़े अदालत के सामने रखने होंगे।
Author: manoj Gurjar
मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।








