अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार की विदेश नीति को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद है, लेकिन उन्होंने साथ ही इजरायल के रवैये और मोदी सरकार की चुप्पी पर भी निशाना साधा। जयराम रमेश ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता दुनिया के लिए सकारात्मक कदम है और इसका व्यापक स्तर पर स्वागत किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्र में सबसे बड़ा खतरा अब भी इजरायल की आक्रामक नीतियों से बना हुआ है।
इजरायल को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल
कांग्रेस नेता ने कहा कि इजरायल के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा लेबनान को “जला देने” जैसे बयान दिए जा रहे हैं, लेकिन भारत सरकार इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार इस पूरे घटनाक्रम से अनजान बनने का प्रयास कर रही है। जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल के प्रति अत्यधिक नजदीकी भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को प्रभावित कर रही है। उन्होंने दावा किया कि सरकार की प्राथमिकता राष्ट्रीय हितों से अधिक कुछ चुनिंदा कारोबारी हितों की रक्षा करना दिखाई देती है।
इजरायली मंत्री के बयान से बढ़ी चिंता
इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन गिवीर ने हाल ही में एक बयान में कहा कि लेबनान को पूरी तरह तबाह कर दिया जाना चाहिए। उनका यह बयान चार इजरायली सैनिकों की मौत के बाद सामने आया। गिवीर ने कहा कि इजरायल अपने नागरिकों की सुरक्षा के मुद्दे पर किसी प्रकार का समझौता नहीं कर सकता। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को समाप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
अमेरिका-ईरान समझौते से बढ़ी शांति की उम्मीद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच फ्रांस के एवियन-ले-बैंस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। 14 बिंदुओं वाले इस समझौते के तहत ईरान ने परमाणु हथियार विकसित नहीं करने की प्रतिबद्धता जताई है। विश्लेषकों का मानना है कि इस समझौते से पश्चिम एशिया में स्थिरता बढ़ सकती है और लंबे समय से जारी सैन्य तनाव में कमी आने की संभावना है।
भारत को भी मिल सकता है फायदा
विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका-ईरान समझौते का भारत पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से कच्चे तेल और गैस की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना है। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात सामान्य होने से भारत के आयात-निर्यात कारोबार को भी राहत मिल सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस समझौते का स्वागत करते हुए उम्मीद जताई है कि इससे क्षेत्र में शांति और स्थिरता मजबूत होगी तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव में कमी आएगी।
राजनीतिक बयानबाजी तेज
अमेरिका-ईरान समझौते के बाद जहां केंद्र सरकार इसे वैश्विक शांति की दिशा में अहम कदम बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे भारत की विदेश नीति पर बहस का मुद्दा बना रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं।
Author: manoj Gurjar
मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।








