US-Iran Peace Deal: ईरान ने झुकाया अमेरिका? शांति समझौते पर उठे सवाल, विशेषज्ञ बोले- तेहरान को मिला बड़ा फायदा

वॉशिंगटन/तेहरान। कई महीनों तक चले तनाव, सैन्य टकराव और वैश्विक ऊर्जा संकट के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते (Peace Deal) पर हस्ताक्षर हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के बीच हुए इस समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छिड़ गई है। कई रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते में ईरान को अपेक्षा से कहीं अधिक रियायतें मिली हैं, जबकि अमेरिका ने कई महत्वपूर्ण मोर्चों पर नरमी दिखाई है।

होर्मुज संकट के बाद बदले समीकरण

विश्लेषकों के अनुसार, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित कर वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बनाया। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। बढ़ते दबाव के बीच दोनों देशों के बीच बातचीत तेज हुई और अंततः समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए गए।

अमेरिकी विशेषज्ञ ने उठाए सवाल

अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञ और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी ब्रेट मैकगर्ट ने समझौते को लेकर आश्चर्य जताया है। उनका कहना है कि दस्तावेज़ को देखने पर स्पष्ट होता है कि ईरान को आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर बड़ी राहत मिली है। मैकगर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने तेल निर्यात प्रतिबंधों में ढील, फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को जारी करने की प्रक्रिया और समुद्री नाकेबंदी हटाने जैसे कदम उठाने पर सहमति जताई है। इसके बदले में ईरान ने मुख्य रूप से वही आश्वासन दोहराए हैं जो वह पहले भी देता रहा है।

ईरान को क्या-क्या मिला?

शांति समझौते के बाद ईरान को मिलने वाले संभावित लाभों में शामिल हैं:

  • तेल निर्यात पर प्रतिबंधों में राहत
  • अरबों डॉलर की फ्रीज की गई संपत्तियों की वापसी
  • होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य व्यापारिक गतिविधियों की बहाली
  • आर्थिक प्रतिबंधों में चरणबद्ध नरमी
  • अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन में सुविधा

विशेषज्ञों का अनुमान है कि तेल निर्यात सामान्य होने पर ईरान को हर साल अरबों डॉलर की अतिरिक्त आय हो सकती है।

परमाणु कार्यक्रम पर बनी हुई है अनिश्चितता

समझौते का सबसे संवेदनशील मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम माना जा रहा है। हालांकि ईरान ने एक बार फिर दावा किया है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा, लेकिन संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) और परमाणु गतिविधियों पर कोई स्पष्ट एवं कठोर प्रतिबद्धता सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय को अंतिम समझौते तक टाल दिया गया है, जिस पर अगले 60 दिनों में अलग से बातचीत होगी।

भारत के विशेषज्ञ ने क्या कहा?

प्रख्यात सामरिक मामलों के विशेषज्ञ Brahma Chellaney ने इस समझौते को कूटनीतिक दृष्टि से ईरान की बड़ी सफलता बताया है। उनका मानना है कि ईरान ने सीमित संसाधनों के बावजूद दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति के साथ लगभग बराबरी की शर्तों पर समझौता करने में सफलता हासिल की है। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता वैश्विक कूटनीति में शक्ति संतुलन और रणनीतिक बातचीत की अहमियत को दर्शाता है।

तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

समझौते की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में राहत देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड और WTI दोनों बेंचमार्क में गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समझौते का क्रियान्वयन सफल रहा तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति सामान्य हो सकती है और तेल की कीमतों में और नरमी आ सकती है।

अंतिम समझौते पर टिकी दुनिया की नजर

हालांकि मौजूदा समझौते को युद्धविराम और तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, लेकिन असली परीक्षा अगले 60 दिनों में होने वाली अंतिम वार्ता होगी। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनने के बाद ही यह तय होगा कि यह समझौता मध्य पूर्व में स्थायी शांति ला पाएगा या नहीं।

manoj Gurjar
Author: manoj Gurjar

मनोज गुर्जर पिछले 5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और खेल, राजनीति और तकनीक जैसे विषयों पर विशेष रूप से लेखन करते आ रहे हैं। इन्होंने देश-दुनिया की बड़ी घटनाओं को गहराई से कवर किया है और पाठकों तक तथ्यात्मक, त्वरित और विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने का काम किया है।

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